15/05/2026
आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री 'राम के नाम' (1992) से ए.बी. बर्धन के ऐतिहासिक भाषण
आज भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, और इसका सबसे बड़ा श्रेय इस देश की 85% हिंदू आबादी को जाता है, जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता को सहज रूप से अपनाया और जीवन में उतारा। यह उनकी उदारता और सहिष्णुता का ही परिणाम है कि विविधताओं के बीच राष्ट्र एक सूत्र में बँध सका। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज़ादी के लिए फाँसी पर चढ़ने वाले शहीदों ने अपना सर्वोच्च बलिदान किसी “हिंदू राष्ट्र” के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत के लिए दिया था जहाँ हर नागरिक को, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो, समान गरिमा और अधिकार प्राप्त हों।
हम सभी धर्मों का सच्चे मन से सम्मान करते हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि एक धर्म के अहंकार की तुष्टि के लिए दूसरे धर्म की आस्था को ठेस पहुँचाई जाए। किसी भी पंथ की शिक्षा दूसरे को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की अनुमति नहीं देती।
हिंदू धर्म के भीतर ही यह विरोधाभास सदा रहा है—उसमें एक ओर गहन सहिष्णुता और मानवता है, तो दूसरी ओर असहिष्णुता और जातिवाद का विष भी। सदियों से संतों और समाज सुधारकों ने इस जातिवाद के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाई, किंतु यह ज़हर आज भी समाज की नसों में मौजूद है। इसके बावजूद एक सकारात्मक बदलाव यह आया है कि आज सत्ता और संसाधनों में उन लोगों को हिस्सेदारी मिल रही है जिन्हें सदियों तक हाशिए पर रखा गया। यह सामाजिक न्याय की दिशा में उठा कदम कुछ पुरानी ताकतों को बर्दाश्त नहीं हो रहा, क्योंकि यह उनके वर्चस्व की नींव हिला रहा है
अयोध्या के संदर्भ में हमारा दृष्टिकोण आस्था और तर्क दोनों पर टिका है। हम स्वीकार करते हैं कि अयोध्या राम की जन्मभूमि है और यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रश्न है। लेकिन क्या अयोध्या का केवल एक ही टुकड़ा पवित्र है? अयोध्या तो समूची पवित्र है। आप वहाँ कहीं भी एक भव्य मंदिर का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन एक खड़ी मस्जिद को ढहाकर ही मंदिर बनाने की ज़िद, यह भगवान राम का सच्चा सम्मान नहीं हो सकता। राम का चरित्र प्रेम, न्याय और सबको साथ लेकर चलने का है। इसलिए हमारा ऐतिहासिक नारा आज भी प्रासंगिक है— “मंदिर भी बनेगा, और मस्जिद भी रहेगी!”
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि आज़ादी के 43 वर्षों बाद भी गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और बुनियादी सुविधाओं जैसे असल राष्ट्रीय मुद्दे गायब हैं, और सारी चर्चा मंदिर-मस्जिद के इर्द-गिर्द घूम रही है। यह कोई धर्म का आंदोलन नहीं, बल्कि कुर्सी की लड़ाई है। रथ पर सवार होकर वोटों की खेती करने वाले इन चेहरों के मंसूबों को हर देशवासी को पहचानना होगा। असली मुद्दे रोटी, कपड़ा, मकान और रोज़गार हैं, न कि मंदिर-मस्जिद के नाम पर बाँटने की राजनीति।
Video credit - आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री 'राम के नाम' (1992
CPIM Kerala CPIM West Bengal
#पॉलिटिक #राजनीति #बीजेपी #राजद #कम्युनिस्ट