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01/11/2024

*अरुणोदय*-०१/११/२४--- गोवर्धन पूजा का भारतीय समाज में गहरा सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, और सामाजिक महत्व है। यह त्योहार विशेषकर उत्तर भारत में दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है और इस दिन भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र के अभिमान को समाप्त करने और गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा करने के उपलक्ष्य में श्रद्धांजलि दी जाती है। इसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1. सामाजिक एकता और सामूहिकता का प्रतीक
गोवर्धन पूजा के दिन समाज में एकता का संदेश मिलता है। इस दिन लोग मिल-जुलकर पूजा करते हैं, घरों में विशेष पकवान बनाते हैं, और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं। इससे समाज में एकता, भाईचारा, और सहयोग की भावना प्रबल होती है।
2. राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक
भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर यह संदेश दिया कि प्रकृति का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है और मानव को अंधविश्वासों के बजाय विवेक और ज्ञान का अनुसरण करना चाहिए। यह पर्व हमारी सांस्कृतिक धरोहर और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है।
3. प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान और संरक्षण गोवर्धन पूजा प्रकृति की पूजा का पर्व है। इसमें गोवर्धन पर्वत को भगवान मानकर पूजा की जाती है, जो यह संदेश देती है कि हमें प्रकृति और पर्यावरण का आदर करना चाहिए। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि धरती, जल, पशु और वनस्पतियाँ हमारी संपत्ति हैं और इनका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है।
4. पारिवारिक और सामुदायिक संबंधों का सुदृढ़ीकरण
इस दिन परिवार के सदस्य एकत्र होकर पूजा करते हैं, गोवर्धन को अन्नकूट चढ़ाते हैं और गोवंश का पूजन करते हैं। इससे परिवार और समाज के लोगों में आपसी मेलजोल और स्नेह बढ़ता है।
5. धार्मिक आस्था का प्रतीक
गोवर्धन पूजा भारतीय समाज में धर्म और आस्था का प्रतीक है। भगवान कृष्ण द्वारा इंद्र का मान-मर्दन करना और गोवर्धन पर्वत को उठाकर गाँववासियों की रक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि सही आस्था और धर्म से ही व्यक्ति सच्चे सुख की प्राप्ति कर सकता है।
6. सांस्कृतिक परंपराओं का संवर्धन
यह त्योहार भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और रीति-रिवाजों का संवर्धन करता है।साधुवाद -- [गुरू जी]
*अरुणोदय*-०१/११/२४--- भारतीय समाजे गोवर्धनपूजायाः गहनं सांस्कृतिकं, राष्ट्रीयं, सामाजिकं च महत्त्वम् अस्ति। अयं उत्सवः विशेषतया उत्तरभारते दीपावलीयाः परदिने आचर्यते, श्रीकृष्णस्य इन्द्रस्य गौरवस्य वधं कृत्वा गोवर्धनपर्वतं स्वस्य लघुअङ्गुले उत्थाप्य गोकुलजनस्य रक्षणं कृत्वा श्रद्धांजलिम् अयच्छति। अस्य महत्त्वं निम्नलिखितबिन्दुषु अवगन्तुं शक्यते ।
1. सामाजिकैकतायाः सामूहिकतायाः च प्रतीकम्
गोवर्धनपूजादिने समाजे एकतायाः सन्देशः प्राप्यते । अस्मिन् दिने जनाः एकत्र आगत्य पूजां कुर्वन्ति, गृहे एव विशेषव्यञ्जनानि निर्मान्ति, सामूहिकभोजनस्य आयोजनं च कुर्वन्ति । अनेन समाजे एकतायाः, भ्रातृत्वस्य, सहकार्यस्य च भावः सुदृढः भवति ।
2. राष्ट्रगौरवस्य प्रतीकम्
भगवान् श्रीकृष्णः गोवर्धनपर्वतम् उत्थाप्य प्रकृतेः संरक्षणम् अत्यन्तं महत्त्वपूर्णम् अस्ति तथा च मनुष्याः अन्धविश्वासस्य स्थाने प्रज्ञां ज्ञानं च अनुसरणं कुर्वन्तु इति सन्देशं दत्तवान्। अयं उत्सवः अस्माकं सांस्कृतिकविरासतां, राष्ट्रियपरिचयस्य च प्रतीकः अस्ति ।
3. प्राकृतिकसंसाधनानाम् आदरः संरक्षणं च गोवर्धनपूजा प्रकृतिपूजायाः उत्सवः अस्ति। अस्मिन् गोवर्धनपर्वतः ईश्वरत्वेन पूज्यते, येन प्रकृतेः पर्यावरणस्य च आदरः करणीयः इति सन्देशः प्राप्यते । अयं उत्सवः अस्मान् शिक्षयति यत् पृथिवी, जलं, पशवः, वनस्पतयः च अस्माकं सम्पत्तिः, तेषां संरक्षणं च अस्माकं दायित्वम् अस्ति।
4. पारिवारिकं सामुदायिकं च सम्बन्धं सुदृढं करणं
अस्मिन् दिने परिवारजनाः समागत्य पूजां कुर्वन्ति, अन्नकूटं गोवर्धनं अर्पयन्ति, गोसन्ततिं च पूजयन्ति । अनेन परिवारस्य समाजस्य च जनानां मध्ये परस्परं अवगमनं स्नेहं च वर्धते ।
5. धार्मिक आस्थायाः प्रतीकम्
गोवर्धनपूजा भारतीयसमाजस्य धर्मस्य आस्थायाः च प्रतीकम् अस्ति । भगवान् श्रीकृष्णेन इन्द्रस्य सम्मानः, गोवर्धनपर्वतस्य उत्थापनं कृत्वा ग्रामजनानां रक्षणं च तस्य प्रतीकं यत् सम्यक् श्रद्धया धर्मेण च मनुष्यः यथार्थसुखं प्राप्तुं शक्नोति।
6. सांस्कृतिकपरम्पराणां प्रचारः
अयं महोत्सवः भारतीय सांस्कृतिक परम्पराः रीतिरिवाजः च प्रचारयति।धन्यवादः - [गुरु जी]
*Arunodaya*-01/11/24--- Govardhan Puja has deep cultural, national, and social significance in Indian society. This festival is celebrated especially in North India on the day after Diwali and on this day tribute is paid to the commemoration of Lord Krishna ending the pride of Indra and protecting the people of Gokul by lifting the Govardhan mountain on his little finger. Its importance can be understood in the following points:

1. Symbol of social unity and collectivity

The day of Govardhan Puja gives the message of unity in the society. On this day people worship together, prepare special dishes at home, and organize a collective feast. This strengthens the feeling of unity, brotherhood, and cooperation in the society.

2. Symbol of national pride

By lifting the Govardhan mountain, Lord Krishna gave the message that conservation of nature is very important and humans should follow prudence and knowledge instead of superstitions. This festival is a symbol of our cultural heritage and national identity.

3. Respect and conservation of natural resources Govardhan Puja is a festival of worship of nature. In this, Govardhan mountain is worshipped as God, which gives the message that we should respect nature and environment. This festival teaches us that earth, water, animals and plants are our property and it is our responsibility to protect them.

4. Strengthening of family and community relations

On this day, family members gather together and worship, offer Annakut to Govardhan and worship the cattle. This increases mutual harmony and affection among the people of the family and society.

5. Symbol of religious faith

Govardhan Puja is a symbol of religion and faith in Indian society. Lord Krishna's humiliation of Indra and protection of the villagers by lifting the Govardhan mountain is a symbol of the fact that only with true faith and religion can a person achieve true happiness.

6. Promotion of cultural traditions

This festival promotes Indian cultural traditions and customs. Thanks -- [Guru Ji]

31/10/2024
16/12/2023

*कैसे शुरू हुए कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष*
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🙏🙏पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है। चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है। दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं।

शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष से जुड़ी कथा
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इस तरह हुई कृष्णपक्ष की शुरुआत
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पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया। ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है। लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे। ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते। दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए। तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया। क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया। कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।

ऐसे शुरू हुआ शुक्लपक्ष
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कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया। वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा। शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी। ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा। इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ। चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे। चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे। शाप में केवल बदलाव आ सकता था। इसलिए चंद्र को बारी-बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है। दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।

कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के बीच अंतर
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जब हम संस्कृत शब्दों शुक्ल और कृष्ण का अर्थ समझते हैं, तो हम स्पष्ट रूप से दो पक्षों के बीच अंतर कर सकते हैं। शुक्ल उज्ज्वल व्यक्त करते हैं, जबकि कृष्ण का अर्थ है अंधेरा।

जैसा कि हमने पहले ही देखा, शुक्ल पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक है, और कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष के विपरीत, पूर्णिमा से अमावस्या तक शुरू होता है।

कौन सा पक्ष शुभ है?
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धार्मिक मान्यता के अनुसार, लोग शुक्ल पक्ष को आशाजनक और कृष्ण पक्ष को प्रतिकूल मानते हैं। यह विचार चंद्रमा की जीवन शक्ति और रोशनी के संबंध में है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की दशमी से लेकर कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि तक की अवधि ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ मानी जाती है। इस समय के दौरान चंद्रमा की ऊर्जा अधिकतम या लगभग अधिकतम होती है - जिसे ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय तय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

14/12/2023

सहस्रार चक्र सिर के शिखर पर स्थित है। इसे "हजार पंखुडिय़ों वाले कमल”, ईश्वर का द्वार या "लक्ष किरणों का केन्द्र” भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य की भांति प्रकाश का विकिरण करता है। अन्य कोई प्रकाश सूर्य की चमक के निकट नहीं पहुंच सकता।

कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है यह समस्या भवसागर से आती है, इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। हजार दलों वालें महापद्म पर, जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है।

सारी तैयारी उसी की साधना की है। शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे में शास्त्र कहते हैं कि “विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो । सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं |

मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंदलहरी में स्नान करते हैं” सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है। ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप । सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ॐ…होता है।

सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है । आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं।

कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आत्मा प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य सपंदन आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है। और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।

परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप चेतन्य स्पंदन महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में दूसरो लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं । परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है ।

आपको याद रखना होगा ,ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है। ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता ,सारा शरीर बेकार हो जाता है। कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है ।

तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं । और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे जितनी श्रद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है। हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं ।

तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है। वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं । गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं ; पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन करते हैं ।

गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते ।क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है।

वास्तव में,सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं। आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर। पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है। हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का।

जब तक दोनों ... मस्तिष्क और आत्मा में यह सपंदन नहीं पहुंचता । हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होना परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है।

जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है। सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है।

यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है तथा आत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है। सहस्रार को कैलास पर्वत के रूप में इंगित करने भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं।

सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों से भी लगभग तीन-तीन इंच अंदर हैं। मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। तत्व दर्शीयों के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है।

सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है।और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है -उसका संपादन करता है।

इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है । शरीर शास्त्र के अनुसार मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।

(1) बृहद् मस्तिष्क-सेरिव्रम (2) लघु मस्तिष्क- सेरिवेलम (3) मध्य मस्तिष्क-मिड ब्रेन (4) मस्तिष्क सेतु-पाँन्स (5) सुषुम्ना शीर्य -मेडुला आँवलाँगेटा। इनमें से अन्तिम तीन को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ ब्रेन स्टीम भी कहते है।

इस तरह मस्तिष्क के गहन अनुसंधान में ऐसी कितनी ही सूक्ष्म परतें आती है जो सोचने-विचारने सहायता देने भर का नहीं, वरन् समूचे व्यक्तित्व के निर्माण में भारी योगदान करती है। वैज्ञानिक इस तरह की विशिष्ट क्षमताओं का केन्द्र ‘फ्रन्टललोब ‘ को मानते है ।

जिसके द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व, आकांक्षायें, व्यवहार प्रक्रिया, अनुभूतियाँ संवेदनाएँ आदि अनेक महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का निर्माण और निर्धारण होता हैं। इस केन्द्र को प्रभावित कर सकना किसी औषधि उपचार या शल्य क्रिया से सम्भव नहीं हो सकता।

इसके लिए योग साधना की ध्यान धारण जैसी उच्चस्तरीय प्रक्रियायें ही उपयुक्त हो सकती है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण के नाम से जाना जाता है। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तैंतीस कोटि देवता रहते, पर उनमें से पाँच मुख्य हैं।

इन्हीं का समस्त देव स्थान पर नियंत्रण है। उक्त मस्तिष्कीय पाँच क्षेत्रों को पाँच देव परिधि कह सकते है। इन्हीं के द्वारा पाँच कोशों की पाँच शक्तियों का संचार-संचालन होता है। मस्तिष्क के विभाजन तथा सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में इसी प्रकार एक ही तथ्य के भिन्न-भिन्न विवेचन मिलते है।

शास्त्रों में इसी को अमृत कलश ‘ कहा गया है। उसमें से सोमरस स्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधा पान करते अजर अमर बनते है। वर्तमान वैज्ञानिक की मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव भरा रहता है जिसे ‘सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड’ कहते है ।

यही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को पोषण,संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्कीय झिल्लियों से यह झरता रहता है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता हैं। अमृत कलश में सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं- कहीं सहस्रार की सोलह पंखुड़ियों का वर्णन है।

यह मस्तिष्क के ही सोलह महत्वपूर्ण विभाग-विभाजन है। शिव संहिता में भी सहस्रार की कलाओं का वर्णन करते हुए कहा है- ‘कपाल के मध्य प्रकाशमान सोलह कलायुक्त सहस्रार की यह सोलह कलायें मस्तिष्क के सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह भाग है।

इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं से युक्त अनेक केन्द्र है। सहस्रार अमृत कलश को जागृत कर योगीजन उन्हें अधिक सक्रिय बनाकर असाधारण लाभ प्राप्त करते है। योग शास्त्रों में इन्हीं ही ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते है ।

इस सहस्रार कमल की साधना से योगी का चित्त स्थिर होकर आत्म-भाव में लीन हो जाता है। तब वह समग्र शक्तियों से सम्पन्न हो जाता हैं और भव बंधन से छूट जाता है। सहस्रार से बाहर आया हुए अमृत पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।

सहस्रार मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं, वरन् दैवी अनुदान हैं ; जिसका सम्बन्ध ब्रह्मरंध्र से होता है। ब्रह्मरंध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार है- दोनों नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुख, दो मल-मूत्र के छिद्र। दसवाँ ब्रह्मरंध्र है।

इसी के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों का आदान-प्रदान होता है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्वगामी प्राप्त करे।

सहस्रार और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई यूनिट के रूप में काम करते है। अतः योग साधना में इन्हें संयुक्त रूप में प्रभावित करने का विधान है। मानव काया की धुरी उत्तरी ध्रुव सहस्रार और ब्रह्मरंध्र ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क बनाकर आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करता है।

भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ जागृत सहस्रार के सहारे निखिल ब्रह्माण्ड से आकर्षित की जा सकती है।चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा जो इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय ज्ञान उपलब्ध होता है, उसका केन्द्र यही है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्मिक चिन्तन से लेकर भक्ति योग तक की समस्त साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है।

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