15/05/2025
राधे-राधे जयश्रीसूर्यदेव। सांसारिक व्यक्ति या वस्तुओं से विरक्त मुमुक्षु,परम हंसों की पंक्तियों को प्राप्त और ईश्वर प्राप्ति की इच्छा रखने वाला योगी किसी की आलोचना नहीं करता। उसका जो स्थूल शरीर है, उसके जो भेद हैं अर्थात नर-नारी का भेद मिट गया होता है। उसके लिए क्या भूमि क्या पलंग, क्या घर क्या वन सुख-दुख सबसे परे रहता है।वो क्या कर्ता है क्या नहीं खुद का कोई भान नहीं होता, तो दूसरे की अच्छाई बुराई का भान कैसे होगा वास्तव में वही योगी है। लेकिन जो विरक्त रहकर दूसरों में कमियां निकालते हैं वो योगी नहीं बल्कि भटके हुए कुमार्ग पर चलने वाले भोगी होते हैं। किसी भी प्रकार का ऊंचा पद पाने के लिए किसी को कुचलकर निकल जाना ही नहीं है। उच्च अस्तर का साधक ईर्ष्या द्वेश नहीं करता।