10/09/2026
उपन्यास-प्रलय निमंत्रण
रचनाकार – उमेश ‘भारती’
खंड : प्रतिज्ञाबद्ध
परिच्छेद : महारथी नंगे लौटे!
यह कम भारी विवशता है क्या!
संसार कहेगा, कुरुवंश के वयोवृद्ध शास्त्रज्ञाता के रहते ऐसी भूल हुई. पर उस ज्ञान विवेक की विद्यमानता का अर्थ ही क्या जब उसे कार्यान्वित ही न किया जा सका हो; जबकि मेरा सम्पूर्ण जीवन ही ऐसी विवशताओं की महागाथा है। मैं जानता था, वहाँ से, त्रेलोक्य की समस्त सेना भी दूम दबाकर भाग खड़ी होनी थी; यदि संसार के हर उल्टे-सीधे कार्यों का परिणाम यूं सफल होने लगे तो ऋषियों को धर्म व सदाचार की व्यवस्था देनी ही न पड़ती, गुरुकुल के नाम तक मिट गये होते– सो कौरव की सारी सेनायें भाग ली। सुशर्मा बंदी बनाया जाकर दया कर छोड़ दिया गया। ये एक तो कुछ सुनते नहीं, कुछ कहने ही नहीं देते, फिर भी विदुर कहने से नहीं चुकता, पर रुग्ण को कड़ी औषधि कहां भाती है। और, वह अंधा व उसकी अंधी बनी अर्द्धांगिनी (कोढ़ में खाज उसका कुटिल भ्राता!) तथा उसके उदंड पुत्र की मूर्ख मंडली सुनती कहाँ है! फिर उनकी उतावले व विवेकहीन आचरण से किसे चोट पहुँचती है? वे तो बच्चे कहे जाकर साफ बच जाते हैं, उत्तरदायी होता है यह बूढ़ा। सारा अपयश भीष्म के माथे पड़ती है, उसने इनके संरक्षण (क्या बुरे आचरणों कर्मों की भी?) प्रतिज्ञा जो कर रखी है।
पता नहीं, ये महा महान् महारथी कर्ण आदि सेना के किस भाग में थे जो अज्ञातवास भेदने का श्रेय न लिया, अब पैंतरा बदल निर्लज्जता से पुनः उलझने उतावले से डींगें हांके दौड़े जा रहे हैं, ऐसे मनुष्यों की विस्मृति बड़ी सुखद है, विशेषकर अपमान जनक क्षणों की! इसके उलट ये तुक्ष्य बातें तो याद रखते हैं, भूल जाते हैं नीति, धर्म, संस्कार, दया व प्रेम। वर्ना...., हम गांवों में पहुँच चुके हैं, पदातियों के अनाचार व घुड़सवारों के हुड़दंग से लोग विस्मित से घर बार छोड़ भाग रहे हैं। विचित्र करुण हाय पुकार है! जब ये मेरी न सुनते तो किसकी सुनेंगे– यह उस सुबलपुत्र की नीति है, ‘वहीं आक्रमण सफल होता है जो शत्रु देश के अणु-अणु में भय का संचार कर दे, इसके लिए गांव-घर उजाड़ना युद्धनीति है।’ क्या ही विकृत वरंच धिकृत् नीति है, पर इसमें यदि मना करूं तो ये वैसे ही तर्क कुतर्क कर सुनेंगे नहीं, यदि मान जायें व हार हो जाये जो कि निश्चित है, क्योंकि मूर्खतापूर्ण कार्यों का परिणाम अधिक विषादपूर्ण होता है –तो ये सारे छोकड़े मुझे ही दोष मढ़ेंगे, सो करें जो कर सकते हैं। ऐसी ही द्विधापूर्ण स्थ्लों पर मेरी स्थिति यंत्रवत् मात्र रह जाती है और प्रारब्ध का खेल देखकर रह जाना पड़ जाता है।
कैसी निरर्थक स्थिति है मेरी, जैसा रहा सम्पूर्ण जीवन!
अंततः मैं करता क्या, ये ऐसे मामलों में मुझे आगे कर खेलने के आदि हैं और मैं आगे पीछे डोलने का। और पता नहीं हम या द्रोण जी न रहें तो ये दुष्ट इन घरों में घुसकर जाने क्या करें; जैसा इन्होंने द्रुपद के यहाँ गुरुदक्षिणा मांगने जाकर उधम मचाया था और ग्रामवासियों ने लात मारकर भगा दिया था; इनकी नीचतायें ऐसे ही अपमान के फल चखाते रहे हैं, पर ये कुत्ते की दुम रहे सदा टेढ़े के टेढ़े!
और फिर मुझे आना क्यों न था, अज्ञातवास की शर्त ही इसीलिए रखी गई थी कि उसे तोड़ी जायेगी और पाण्डुपुत्रों को हस्तिनापुर घुसने न दिया जायेगा, चाहे उन्होंने कितनी ही ईमानदारी से शर्त का निर्वाह किये हों। क्या अज्ञातवास तोड़ने का काल बीत नहीं गया है ? सच कहिए तो वह घृणित द्यूत व वनवास-अज्ञातवास आदि सब जादूगर का तंत्र जाल था, समय को और खींच ले जाने का, तेरह वर्ष का आनंद व्यसन का समय लेकर अब ये अज्ञातवास तोड़ने का उद्घोष कर फिर उन्हें बारह वर्षों का वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास के कभी न टूटने वाले चक्र में डाल देना चाहते हैं। और वे भोले पांडव उनके इस तंत्रजाल में न आयेंगे कौन कह सकता है ! इन धृतराष्ट्रपुत्रों के शर्तों-नियमों में कोई तथ्य नहीं होता, कोई धर्म नहीं होता और वे पांडव उसे ब्रह्मवाक्य मान निभाते रहे। यहाँ तो हर बात का प्रत्योत्तर युद्ध है! बाबा, फिर शर्तों की क्या जरूरत थी जब उन्हें अंततः मानना ही नहीं था ?
किन्तु... जो कुछ टुकड़ों में कर्ण-दुर्योधन ने कहा है,- निर्लज्ज सीधे कह नहीं सकते थे कि विराटेश्वर बिना कीचक के भी प्रबल है और हम लात खाकर चले आये हैं, ( फिर भी मुंह दिखाते कुछ लज्जा तो है नहीं ) कुछ तो कालिख पोंछ दीजिए– उससे मैंने यही समझा है कि पाण्डुपुत्रों ने त्रिगर्तो की खूब दुर्गति की है वर्ना इतनी शीघ्रता से पीठ दिखाने वालों में वे नहीं हैं, पर पीठ दिखायेंगे जरूर क्योंकि, इन सबकी युद्धनीति में वीरगति का अर्थ मूर्खता है, गति हुई तो फिर युद्ध का आनंद ही क्या रहा ? इनके लिए भोग ही सर्वोपरि है, बाकी धर्म-कर्म गौण। भींगी बिल्ली की भांति भाग के आते हैं और इनकी डींगें तो देखिए, इतने हाथी मारे, इतने घोड़े उड़ा दिए– पता नहीं जानवरों ने ही क्या बिगाड़ा था, अथवा बेचारे जानवर निःहथे थे इसलिए !
विडंबना तो यह है कि इन छोकरों के खेल में मुझे भी लिप्त होना पड़ता है। दुर्योधन फिर भी राजकुमार है, उसकी– उसके समूचे वंश की चाकरी जीवित रहने तक मैंने स्वयं ले रखी है, पर ये सूतपुत्र और सुबलपुत्र ! इनका तो मैं मुख भी देखना नहीं चाहता। दुर्योधन को बिगाड़ने में संपूर्ण श्रेय है है इनका। अनुमोदन अनुमति के लिए उधर दो अंधे बैठे ही हैं। और मैं, क्रूर बनिये के बोझ भरे शकट में जुते बैलों की भांति चिलचिलाती धूप में दौड़ा चला जा रहा हूँ, तिस पर भयाक्रांत भागती प्रजा का त्राहिमाम् अलग उद्दिग्न किये जा रहा है।
पता न कब त्राण मिलेगा इस प्रकार के कुकृत्यों के साधन बने रहने से ! (स्वमेव दीर्घ निःश्वास निकल पड़ी है।) मुझ जैसे श्वसुर के समक्ष नग्न हो जघण्य रुप से अपमानित हुई, वस्तु की तरह द्यूत में हारी जाकर दंड में वनों की धूल फांकी, वहाँ भी जयद्रथ सदृश नीच कुटुंब द्वारा अपहृत हुई, फिर अज्ञातवास की शर्त पूरी करने के लिए दासी बनकर वहाँ भी अपमानित हुई– और मैं वहाँ भी शिकारी श्वान की भांति झपटने जा रहा हूँ। कितनी श्रीवृद्धि कर रहा हूँ मैं भरतवंश की यशोगाथा में !
घोर पतन है !
जहाँ राजवंश की प्रतिष्ठा ही नग्न नर्तन कर रही हो, वहाँ साम्राज्य की कौन कहे। पता नहीं कितने अभी नैतिकता के शिखर टूटने हैं।
सब कुछ तो मेरे देखते-देखते हुआ है !
एक लता, जो अनधिकार अन्यत्र बढ़ रही थी, कोमल तुच्छ समझ कर जिसकी हम ने अंधमोहवश उपेक्षा की , वहीं अब अजगर सदृश हमें जकड़ चुकी है—।
काश, जब मैंने सुना, दुर्योधन ने भीम को विष दे बांधकर मां गंगा में फेंक आया है, तभी कोई निर्णायक निर्णय लिया होता—
जब विदुर ने कहा कि धृतराष्ट्र की ही सम्मति से दुर्योधन ने वरनावत में लाख के घर बनवा पाण्डुपुत्रों को जला डालने के लिए भेजा पर वे सतर्कता व व्युत्पन्नमति से बच निकले थे, तब ही कोई ठोस पग उठाया होता—
और जब कुलवधू दाँव पर लगाई जाकर नग्न की जा रही थी, तब मैं धर्म की मीमांसा करने लग पड़ा था— वह कोई वक्त था ऐसी बातों का ? उस वक्त तो एक ही धर्म था, कोष से निकलती तीक्ष्ण तलवार और रुण्ड से पृथक पृथ्वी पर नाचते उन निर्लज्जों के मुण्ड !
पर, कहाँ कर सका मैं ऐसा !
मगर ठहरिए, उस समय अधिक मूढ तो युधिष्ठिर दिख रहा था, क्या आवश्यकता थी उसे सुबलपुत्र और सुतपुत्र की बातों में आकर कुलवधू को दांव पर लगाने की, वह क्या कोई वस्तु थी ? और उसके अनुज– उन्हें तो कुन्ती ने जने थे, उसे क्या अधिकार था– और अनुजों के बाद स्वयं हार गया, द्रौपदी फिर भी उसकी तुलना में स्वतंत्र थी, फिर उसे कैसे दांव पर रख सका ? कम से कम वह द्रुपद की राजपुत्री के रुप में स्वतंत्र अस्तित्व तो थी ही और वह सब कुछ हारा जा कर फिर भी दुर्योधन का दास मात्र था ! यहीं तो वह कह रही थी, पूछ रही थी हमसे–
अभी जो मैं यह सब कह रहा हूँ, तब क्यों चुप था मैं, शब्दों का वैसा भारी अकाल कभी न पड़ा– तो क्या सच में उस सुबलपुत्र ने माया फैला रखी थी ? नहीं इसतरह भागीदारी से पीछा न छुड़ाया जा सकेगा। पर आप ही विडंबना देखिए, जिस द्रौपदी को जीता अर्जुन ने, उसे एक तो भार्या बनाया, फिर वस्तु की तरह दांव पर लगा दिया– धर्म तो उसी वक्त उसका साथ छोड़ चुका था। धूर्तों की धूर्तता का शिकार होना कोरी मूर्खता है, और अनैतिकता को बढ़ावा देना है, और कुछ नहीं। इसमें कोई धर्म नहीं और युधिष्ठिर ने सदा यहीं किया—
यदि एकबार भी वह विवेक का सहारा लेकर कुछ भी बोला होता तो उसी को आधार बनाकर बहुत किया जा सकता था, पर वह तो चुप था ! वह दिन ही ऐसा था, जैसा कभी किसी इतिहास में देखने न आया– ऐसा ही था वो कुरुवंश की उज्जवल कीर्ति में कालिख पोतने वाला मनहूस दिन !
मैंने स्वयं को कलंकित होने से बचाने के लिए पूरे वंश के मुँह में कालिख पुतवा ली, तभी तो चुप्पी साधे बैठा रहा और अनर्थ होते रहने दिया। चुप रहकर क्या मैं पक्षपात के आरोप से बच गया ? कभी नहीं, वे हमेशा मुझे व विदुर को पाण्डुपुत्रों का पक्षपाती समझते हैं। इसे कहते हैं, नीच की मित्रता भी बुरी, शत्रुता भी। (जुगुप्सा से मस्तिष्क भिन्ना उठा है, वैसे भी– मांसों की चिरायध गंध सी आरही है, दृष्टि उठाकर देखता हूँ, सेना एक श्मसान में पहुँच गई है, तो कीचक और उसके बंधु-बांधवों के शव अभी तक जले नहीं ?
सुना है, विराटेश्वर ने सारे कीचक बंधु-बांधवों को एक ही चिता पर चुनवा दिया— यह है दुष्कृत्यों का परिणाम ! डेढ़ गज पृथक भूमि भी न मिली !
मूर्ख दुर्योधन ! देख लो, साधी नारी के अपमान का परिणाम ! तुम जो अब तक बचते रहे हो अपनी या अपने मुँहफट मित्रों की युक्ति से नहीं वरन् सगे बंधु समझे जाकर ! और कहाँ है दुःशासन, अबला जान जिसे भरी सभा में नग्न करने का दुःसाहस किया था, उसे अपमानित करने वाले कीचक का शव इसमें ढूंढ़े ! और निकट भविष्य में अपना परिणाम झांक कर अपनी आँखें देख ले।
यदि अब भी— (हैं ! यह असमय कौन निर्लज्जता पूर्वक हँस रहा है ? अरे, वह महान विदूषक सुबलपुत्र ! दृष्टि उठाता हूँ पर, कहीं दिखता नहीं, बस वहीं अस्पष्ट वकोक्ति और निर्लज्जतापर्ण हँसी ! और वह सूतपुत्र भी— अरे, वह अश्वथामा भी ! क्या बात हो गई जो इस श्मशान में आकर गम्भीर होने की जगह मुसंडे ठहाके मार रहे हैं ! कुछ अशिष्ट सैनिकों के भी स्वर सुनायी दे रहे हैं । निर्लज्जता और अशिष्टता की हद है ! मेरी दृष्टि ढूंढ़ती है, जिधर ये हैं, पर चिलचिलाती धूप में स्पष्ट कुछ नहीं दिखता । पर, जिधर लक्ष्य कर ये हँस रहे हैं, उधर कारण ज्ञात करने के लिए दृष्टि गड़ाता हूँ तो वहाँ भी लू के सिवा कुछ दृष्टिगत नहीं होता । उलझन से झुंझलाकर खूब आँख गड़ाकर देखता हूँ, कंकड़ मिले धूल भरी लू के अंधड़ में एक सैनिक भागता-सा दीख रहा है, और कोई स्त्री उसके पीछे पड़ी है। दूर तक विजन है, बस एक खाली रथ दिखता है जो उन्हीं की होगी । मैं अपने विचारों में इतना तल्लीन था कि समझ ही न सका हुआ क्या था और हो क्या रहा है।
लीजिए ! उस स्त्री ने पीछे से पकड़ कर उस भगोड़े सैनिक को जबरन रथ की ओर ले चली है और वह भीरू बच्चे की तरह छूटने को छटपटा रहा है। विचित्र जैसा देश है वैसी ही विचित्र बात है। अरे, उस स्त्री ने तो उस सैनिक को जबरन उठा रथ तें बैठा लिया और रथ यह जा वह जा—
इधर ठहाकों का विस्फोट—' हो चुका घमासान युद्ध और भगा दी गई हस्तिनापुर की सेना ! हा हा हा हा !!'
हँसी तो मेरी भी निकलने को है, पर सेना के अग्रभाग में तो जैसे कुँए में ही भंग पर गई हो। पर आचार्य जी यदि साथ होते तो— उनके लिए मेरी दृष्टि घूमती है तो वे स्वयं इसी ओर रथ भगाये आते दीखते हैं। पर इन मूखों की भाँति उनके चेहरे पर हास्य नहीं है, वे तो अतिशय गम्भीर से जान पर रहे हैं, उनके मुख पर तो हास्य का चिह्न तक नहीं—
" भीष्म जी. बड़े ही अपशकुन हो रहे हैं, प्रचण्ड आँधी के पर्व जैसी निस्तब्धता होती है, वैसा ही वातावरण क्षुब्ध हो उठा है ! मटमले रंग से आकाश आच्छादित हो गया है, रूक्षवर्ण के बादल दिखाई पर रहे हैं, दिशाओं से आग सी बरस रही है- कंकड़ बरसाने वाली अंधड़ भी शुरू हो गया है !"
सच ही तो !
और यह कोई शुभ संकेत तो नहीं !
एक अच्छे सेनापति के यहीं लक्षण हैं, वह हर परिस्थिति-काल का सुक्ष्मता से अवलोकन-विवेचन करता है और सतर्क रहता है, क्योंकि जय-पराजाय का दायित्व उसी के सिर होती है। इन मूखों की तरह नहीं जो बिना समझे-बूझे गला फाड़ कर हँसते हुए स्थिति हास्यास्पद कर अपमान करावें।
आचार्य ने जो कुछ कहा है, वह सब मैं भी लक्ष्य कर रहा हूँ, उसपर से स्थान श्मसान तो है ही, सो जानवरों की अरुचिपूर्ण चिल्लाहट वातावरण को और भी विभत्स बना रही है। वे कह रहे हैं—
" सेना को व्यूहवद्ध कर लें, सबको सतर्क कर दें ! ये मूर्ख जिन्हें देख हँस रहे हैं वह स्त्री वेषधारी और कोई नहीं, स्वयं गाण्डीधारी अर्जुन है ! तभी तक कल्याण है जब तक वह अपना —"
अभी आचार्य की बात उनके मुँह में ही है कि जोड़ों से रथ की घर्घरहट सुनायी पड़ती है, मेरी दृष्टि लू में दौड़ती है- पर अब भी धूल के गुब्बार के अतिरिक्त कुछ मालूम नहीं पड़ता। और—
पता नहीं, पूर्वानुमान की प्रामाणिकता अथवा भय से- आचार्य जी बदहवास हो सब तरफ दौड़-दौड़ कर कहे जा रहे हैं—“ देखो, देखो ! मैं कहता था न कि वह स्त्री नहीं अर्जुन है, देखो यह रथ की घर्घरहट ! मैंने पहले ही कहा था, भयंकर युद्ध के लक्षण हैं- बड़े ही अशुभ शकुन हो रहे हैं ! देखो, तुम्हारे वाहन अप्रसन्न होकर रोते से जान पड़ते हैं- घोड़े हींस रहे हैं, रोंए खड़े हो गए हैं उनके ! —"
तभी जाने कहाँ से अधिरथ का छोरा प्रकट हो गया है, "रोंएं घोड़ों के ही खड़े हुए हैं या आपके भी ? यह तो सभी देखते हैं कि ये हींसते हैं सो हींस रहे हैं, किसी ने इन्हें हँसते देखा है जो अब देखेंगे ? ( अब मेरी हँसी फूटना चाहती है—) परंतु क्या कारण है कि आप विक्षिप्त से घुम रहे हैं ? एक रथ ही तो घर्हरा रहा है कोई पहाड़ तो नहीं टूट—”
घन गर्जन की तरह तभी चारों दिशाओं को भेदता हुआ शंखनाद हुआ ! यह स्वर हम सभी पहचानते हैं, शायद इसी लिए आचार्य आसन्न भवितव्य को स्पष्ट देख गला फाड़कर पुकार लगा रहे हैं, “ सुन लिया न देवदत्त का घोष ? यह रथ की पास आती घर्घरहट निश्चय ही अर्जुन की है ! अब गांडीव का टंकार हुआ चाहता है, सब आयुद्ध सम्हाल लो ! राजा दुर्योधन ! अर्जुन आ रहा है ! ”
“वह अर्जुन ही तो है, फिर क्या हुआ, उल्टे हमारा काम ही बन गया ! जिसकी खोज में हम गलियों में धूल फांकने जाने वाले थे, वह स्वयं ही प्रकट हो गया है। और फिर अकेला ही तो है– कोई सेना भी तो नहीं है साथ में !”
आचार्य जी तो जैसे उन्मत ही हो गये हों, ऐसे चीख पड़े हैं,”अरे, वह अकेला ही हम सब पर भारी है !”
यथार्थ है, पर कौन मानता है—
“ बकवास है।” देखिए तो जरा अधिरथ के इस बैल को,”वह मेरे और दुर्योधन की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है !”
जैसे अग्नि में घी पड़ा हो, आचार्य क्रोध से पागल हो चीख रहे हैं और मैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो गया हूँ, “ मूर्ख हो तुम ! कई बार तो इसी अर्जुन की लात खाकर लौटे हो, फिर भी तुम्हारी आत्मप्रवंचना गई नहीं है !”
आचार्य जी का स्वर ही उत्तेजित है, वरना कह वह सत्य ही रहे हैं। यह लड़का द्रौपदी के स्वयंवर में ऐसे ही उलझकर दुम दबाकर लौटा था, पहले भी द्रुपद की लात खाकर आनेवालों में यही था, और जब गंधर्वों ने दुर्योधन को बाँध रखा था तब यह महापराक्रमी शूर वीर कहाँ था, क्या परदेश गया हुआ था ? इस बीच वह बोलने लग पढ़ा है, “यदि आपको ऐसा ही अर्जुन का भय है तो आप रणक्षेत्र से हट जाइए और चुपचाप देखते रहिए, किस तरह मैं तीखी नोकों वाली सर्पों की भाँति विषाक्त तीरों से अर्जुन को उसी प्रकार ढकता हूँ जिस प्रकार वर्षा की बौछारें पर्वतों को ढक लेती है ! आज ही मैं इस अर्जुन को मारकर दुर्योधन का अक्षय ऋण चुकाऊंगा ! मुनिश्रेष्ठ परशुराम से जो मैंने शस्त्र प्राप्त किये हैं, उनका आश्रय लेकर मैं इंद्र को भी भगा सकता हूँ ! मैं—”
यह छोकड़ा तो महान् खच्चर होता जा रहा है ! वस्तुतः मैं इसे निकृष्ट सूअर ही समझता हूँ। आत्मप्रवंचना में इतना बेसुध कदाचित् कोई मद्यप भी न हो। वर्ना इसके कर्म जगत्विदित है। देखिएगा, भागनेवालों में प्रथम यहीं होगा ! कहाँ है सुबलपुत्र, एक आध वह भी वाक्कला का परिचय दे जाये, बड़ा सवासेर बना फिरता है ! इस सूतपुत्र के आगे वह भी पानी भरने लगेगा।
लीजिए, बहनोई के सहायतार्थ स्याले भी आ पहुँचे, “राधेय ! युद्ध के विषय में सदा ही तुम्हारा मत क्रूरतापूर्ण (या कि मूर्खतापूर्ण !) रहता है। तुम न तो कार्य का स्वरूप ही जानते हो न उसके परिणामों का ठीक-ठीक विचार कर पाते हो। आज तक जो कुछ अर्जुन ने कर दिखाया है, जबकि वह विपत्ति में थे, वैसा कुछ तुमने कभी किया है ? तुमने सदा ही—”
कोई अंतर नहीं पड़ता कृप जी, यह स्वयं इस महावीर को ज्ञाता होगा, इसीलिए तो कोरी आत्मप्रशंस से संतोष करता है। यह चेष्टा बेवक़्त की है, पर कैसे सांड की तरह डूँकार रहा है, “कृपाचार्य ! आपलोगों को युद्ध नहीं करना है तो हट आइये, व्यर्थ में ही आये थे।”
“बिना लड़े यहाँ से कौन है जो हस्तिनापुर लौट जायेगा ! (पता नहीं इस दुर्योधन के सिर में मात्र भूस ही भरा है क्या, कह क्या रहा है यह !) - पैदल भागने वाले यदि वनों में भी छिपना चाहें तो मेरे तीखे वाणों से छिन्न-भिन्न कर दिये जायेंगे ! हाँ, घुड़सवारों के विषय में संदेह है—।” (उनके भागने पर या तुम्हारे रोक सकने पर ?)
“राजन, द्रोण को बाद कर कोई रणनीति बनाईये, ये लड़ना नहीं चाहते। अर्जुन का कुछ ज्यादा ही भय इनको लग गया है जिससे इन्हें हर वस्तु में अपशकुन ही अपशकुन दिखाई पड़ रहा है।”
इतना सुनना है कि बड़ी देर से लाल-पीला हो रहा अश्वत्थ उबल ही तो पड़ा है, “कर्ण ! तुमने कभी अर्जुन को किसी युद्ध में हराया भी है क्या ? तुम लोगों ने सदा ही धूर्तता से पाण्डुपुत्रों की भलेमनसी का लाभ उठाया है, उनके क्रोध का सामना नहीं किया है। और दुर्योधन ! जिसप्रकार तुमने धूर्ततापूर्ण द्यूत खेल कर राज्य प्राप्त किये थे, निल्लर्जता पूर्वक द्रौपदी के वस्त्र खींचे थे— अब तुम्हीं लोग युद्ध भी करो ! तुम्हारे ही मातुल और यह मित्र ही क्षात्रधर्म के पण्डित हैं, अब वे ही युद्ध करें ! हम मत्स्य देश पर आक्रमण करने आए थे, यदि उनकी ओर से प्रत्याक्रमण होता है तो हम लड़ लेंगे मगर अर्जुन से हमारा कोई प्रयोजन नहीं।"
दुर्योधन अवाक् खड़े-खड़े कृप व द्रोण जी का मुख तकता है परन्तु वे कुछ नहीं बोलते। फिर मेरी ओर देखता है, मैं कह देता हूँ, "अश्वत्थामा ठीक कह रहा है, कृपाचार्य जी का दृष्टिकोण भी ठीक है और आचार्य द्रोण ने भी उचित कहा है।"
अब तो दुर्योधन भींगी बिल्ली हो गया है और उसका बड़बोला मित्र थरथर काँप रहा है! दोनों ही बिल्कुल गिरगिट की तरह मुझे देख रहे हैं।
हठात् एक अज्ञात भय मन में उठता है, इनकी करनी से हस्तिनापुर की नाक ही न कट जाये (अभी तक बचा भी है क्या! ); जैसी त्रिगर्तों की कटवा आये हैं। अतः किसी प्रकार सुरक्षित हस्तिनापुर इन्हें लौटा ले जाना ही अभीष्ट होना चाहिए। अतः कह उठता हूँ, "कर्ण ने भी क्षात्रधर्म की प्रतिस्पर्धा में कुछ अत्योक्ति कर डाले हैं, अतः दोनों आचार्य से वह क्षमा मांग ले। और दुर्योधन तुम भी। यह समय मतभेदों के लिए नहीं है, इसे पीछे ठीक करते रहना। इस समय यहीं देखना है कि हमें क्या करणीय है, अतः आचार्यद्वय, आप लोग क्षमा करें और वस्तुस्थिति पर ध्यान दें।"
पता नहीं दुर्योधन कैसे इतना सीधा हो गया है कि अपने और कर्ण की तरफ से क्षमा याचना करने लगा है, इतनी शीघ्रता से इसे झुकते आज तक नहीं देखा। सच है, युद्ध बड़े-बड़े शूरमा के कस-बल ढीले कर देता है। और जहाँ अर्जुन का सामना हो वहाँ तो देवता भी को सोचना पड़ता है।
तभी मैं धनुष की टंकार सुनता हूँ, इसे कोई भी कह देगा कि यह एकमात्र गाण्डीव की टंकार है! मैंने देखा, आचार्य जी ने फिर मुँह खोला- किन्तु यंत्रवत् मेरे वर्जित के स्वर में हाथ उठ जाने से वे मुख के शब्दों को गटक गये।
मैं दुर्योधन को कहता हूँ, "दुर्योधन! हम सब अर्जुन को देखते हैं, तुम पशुधन को लेकर हस्तिनापुर की ओर बढ़ो।"
अंधे को चाहिए क्या, दो आँखें। मैंने कहा नहीं कि दुर्योधन अपने अंगरक्षकों को लेकर चला गया। मैंने कमर से शंख निकाला और फूँक दिया। तभी दो सनसनाते तीर आकर मेरे चरणों के पास गिरे- दो आचार्य जी की ओर भी मैं उनकी ओर देखता हूँ तो वे बोलते हैं, "अर्जुन ने हमें प्रणाम किया है।"
मैंने सहमति में सिर हिला कर कुछ न कह रथ बढ़वा लिया।
साथ बढ़ते हुए आचार्य जी पूछते हैं, "पाण्डु-पुत्रों के अज्ञातवास पूरे हो चुके हैं न?"
"कब के! अब तो पाँच माह से उपर हो रहे हैं। पर यहाँ कोई सुनने वाला नहीं है।"
"आप ठीक कहते हैं। वर्ना पाण्डु-पुत्र अभी प्रकट नहीं होते!"
तभी दो तीर और सनसनाते हुए आये और दोनों कानों को छूते हुए निकल गये।
"अर्जुन ने कुशलक्षेम पूछा है, क्या आपसे भी?"
द्रोण जी के पूछने पर मैंने सहमति में सिर हिला दिया। इस समय न मुझसे कुछ कहा जाता है न सोच ही पाता हूँ, अज्ञातवास पूर्ण होने की बात कहकर सारी बात ही जैसे समाप्त हो गयी। बेचारे धर्मात्मा पाण्डुपुत्र ! उनके द्वारा पूरी निष्ठा से अज्ञातवास पालन किये जाने पर भी ये सब गाल बजायेंगे। अंततः युद्ध ही निराकरण था, जभी युद्ध कर लेते; तेरह वर्षों के वनवास के नाटक की क्या आवश्यकता थी ? पर नहीं, इस तरह ये उन्हें कमजोर बनाना चाहते थे, पर क्या पाण्डुपुत्र वनों में कमजोर हुए हैं ? और महलों में रहकर इन्होंने क्या शक्ति अर्जित की है ! व्यभिचारों में अपना ब्रह्मचर्य ही गंवाया है। उधर पाण्डुपुत्र अग्नि में पड़े स्वर्ण की तरह कुंदन की तरह निर्मल होकर निकले हैं —
"अर्जुन तो भाग रहा है !"
दुःशासन का स्वर सुनाई पड़ा तो मैंने चौंक कर सामने देखा और बोल पड़ा, “मूर्ख! वह भाग नहीं रहा, दुर्योधन के पीछे गया है।”
और हमारे देखते ही देखते आग्नेयास्त्रों से दुर्योधन की सेना को तितर-बितर कर उसे घेर लिया है। और घायल दुर्योधन को उसका सारथि भगा ले गया।
सम्पूर्ण सेना को घुमवा लेना कठिन था, और अर्जुन की तरफ की हस्तिनापुर की सेना उसके आग्नेयास्त्रों से स्वाहा हो रही है। अभी अर्जुन सेना में ही उलझा है कि पीछे से वार करता कर्ण पहुँच गया है। तिलमिलाकर अर्जुन ने रथ उसकी ओर मोड़ लिया है और वह वो करतब दिखा रहा है कि— ठहरिये, वह कर्ण कहाँ चला गया ? अरे ! वह तो औंधे मुँह रथ में पड़ा है और उसका सारथि पीछे लिये जा रहा है। तब कृप जी सामने आये। पीछे से सुबलपुत्र भी बढ़ा पर वह मुँह बाये खड़ा हो गया है और उनके करतब निस्तब्ध होकर देख रहा है, प्रतीत होता है उसकी जिह्वा तालू से जा चिपकी है। अथवा, उसके अक्षय शब्द-भंडार में भीषण दुर्भिक्ष पड़ा हुआ है ! वैसे, हम भी सारे के सारे अर्जुन एवं कृपजी के हस्तकौशल खड़े देख रहे हैं। अंततः युवा शिष्य के समक्ष गुरु शिथिल पड़ने लगे तो उनके अंगरक्षक उन्हें घेरे में लेकर दूर निकाल ले गये।
अब कृपजी का स्थान द्रोणजी को लेना पड़ा !
पहले तो गुरु-शिष्य खेलते रहे और हम उनकी कलायें देख मुग्ध होते रहे, फिर युद्ध गम्भीर हो गया और हमारी साँसें तक रुक गयीं। अंततः जैसा अपेक्षित था, युवा शिष्य के समक्ष वृद्ध गुरु को ही हटना पड़ा।
पिता की पराजय से क्षुब्ध होकर अश्वत्थामा आगे बढ़ा।
फिर तो दोनों गुरुभ्राता में खूब छनी।
परंतु लीजिए, जाने कर्ण फिर कहाँ से आन पड़ा और बाणों की झड़ी लगा दी। इस हस्तक्षेप से क्षुब्ध होकर अश्वत्थ लौट पड़ा है और युद्ध से विरत हो गया है। वस्तुतः दोनों महारथियों के बीच में आकर इस सूतपुत्र ने दोनों का ही अपमान व युद्धनियम की अवहेलना की है। जबकि इस हस्तक्षेप के लिए कोई कारण समुपस्थित नहीं था। दोनों में से कोई शिथिल भी न हो रहा था। वैसे, एक शिकार पर दो शेर नहीं झपटते। यदि दोनों एक से पराजित होते तो कितनी भर्त्सना होती, दोनों होते, जो अवश्यंभावी था, तो ये कटी नाक लिये पता नहीं कहाँ जाते! अतः अश्वत्थ अब आगे आने से रहा।
और कर्ण !
वह मूढ़ वाक्युद्ध में बेसुध है, वंचक को पता नहीं, उसने अर्जुन को विश्राम के कितने ही क्षण दे डाले हैं और अब उससे पार पाना असंभव की सीमा तक कठिन है।
अरे, इसने तो शक्ति चला दी !
किन्तु वह तो टूटे नक्षत्र की भांति भूमि पर आ रही है !
और, इधर कर्ण ! वह टूटे रथ से जान बचाकर पैदल भाग रहा है, उसके पार्श्व सैनिक व सारथि जाने कहाँ गायब हैं। पता न क्या हुआ ? निर्लज्ज कर्ण को ये क्षण कहाँ याद आवेंगे जब अकेले में सांढ़ की तरह डकार रहा होगा !
तभी मैंने दुःशासन को बढ़ते देखा, भय ने मुझे झकझोर दिया। भयंकर रुप से कुपित अर्जुन द्यूत-प्रकरण को याद कर इसे कदाचित् ही जीता छोड़े !
मैं चिल्ला पड़ता हूँ, "दौड़ो ! दुःशासन को घेरे में लेकर युद्ध करो। वरना इसे कुछ हुआ तो दुर्योधन किसी को जीता न छोड़ेगा !"
दुःसह, विंशति और विकर्ण ने मिलकर दुःशासन को घेरे में ले लिया और व्यूह ठीक कर ली। परन्तु, अर्जुन के एक ही वाण ने आकर सारी व्यूह रचना काई की नाईं फाड़ दी ! चारों भाई कबके रण छोड़ चुके।
देखता हूँ, अब मुझे ही आगे बढ़ना होगा।
क्षत्रियधर्म बड़ा कठोर है, विशेषकर युद्धभूमि में।
वैसे भी युद्ध भूमि से एकाध घाव खाये बिना लौटना कितनी अपमानजनक होती ! अतः मैं भी पोते से जूझ पड़ा हूँ। प्रथम मन ही मन मुस्कराते हुए पैंतरे लिए, फिर झपटने का खेल किया- खेल ही तो ! आखिर बच्चे ने क्या बिगाड़ा है मेरा या किसी का भी ! यह हमसे लड़ इसलिए रहा है कि हमने लड़ने पर बाध्य किया, वर्ना कुछ इसने नाई भेजकर हमें बुलवाया न था !
पर रुकिए, प्रतीत होता है बात खेल तक ही न रहेगी। कदाचित् खुलकर खेलना पड़ेगा। ठीक है वत्स, दादा से एकाध नये हाथ भी सीख लो।
किन्तु देखता हूँ मेरा पौत्र खेलना व्यर्थ समझ रहा है इसलिए उसने दिव्यास्त्र निकाल लिया है। अच्छा ही है, कैसे भी शीघ्र निपटारा हो कि हम अपने-अपने ठिकाने जाकर लगें। यह युद्ध कितना व्यर्थ है, आप इसीसे अनुमान लगा सकते हैं कि अभी हमीं दोनों को ज्ञात नहीं हम क्यों लड़ रहे हैं !
जहाँ तक कर्ण-दुर्योधन की बात है, इस चंडाल-चौकड़ी को सदा नाक कटवाने का अभ्यास है, सो कटवाकर (मैंने भी उत्तर में दिव्यास्त्र छोड़ दिया है।) वे जा चुके हैं। (दोनों दिव्यास्त्र उड़ते हुए सर्पों का भांति घोर घनगर्जन कर मिल गये हैं।) अब युद्ध में रखा ही क्या है ! (अर्जुन ने फिर दूसरा दिव्यास्त्र निकाल छोड़ दिया है। मैंने भी।) वस्तुतः इन्होंने वनों की धूल ही नहीं छानी है, उद्योग भी किया है (पुनः दोनो अस्त्र टकराकर वायु में विलीन हो गये।) जिसका प्रमाण ये दिव्यास्त्र और यह उसका हस्तकौशल है ! (पुनः एक अन्य दिव्यास्त्र उसने निकाले, पर मेरा मन भर गया है फिर भी उत्तर तो देना ही है। सो दे दिया।) दिव्यास्त्र के काट दिव्यास्त्र ही होते हैं, इनका प्रतिकार न हो तो पूरी पृथ्वी को विनष्ट कर सकते हैं। पर यह खेल व्यर्थ है। वत्स अर्जुन ! तुम्हें पता है, इन दिव्यास्त्रों से मुझसे कोई महीनों पार नहीं पा सकता, मनुष्य हो या देवता ! व्यर्थ समय गंवा रहे हो। यदि मुझसे पीछा छुड़ाना ही है तो (खूब ही हम दिव्यास्त्र चमका रहे हैं, जिस गुरु का वह शिष्य है उन्हीं का मैं भी शिष्य रह चुका हूँ। समान ज्ञान हो से किसी के भी अनिष्ट की सम्भवना न के बराबर है। मेरे अस्त्र वह नष्ट कर रहा है और मैं उसके। ) हाँ, तो मैं क्या कह रहा था– अच्छा, तो यदि......आह ! ( मैं पीड़ा के अतिरेक से कराह उठता हूँ और पार्श्व से आ लगा बाण आश्चर्य से निहारता हूँ । यह कब कहाँ से आ लगा, कहना मुश्किल है। मैंने लड़खड़ा कर रथ का कुबर पकड़ लिया है। पीड़ा में भी मेरे होंठों पर मुस्कान की लहर दौड़ गई। ) क्या यही नहीं चाहता था मैं ? और क्या कह रहा था अभी मैं ? पर अंत तक भान भी नहीं हुआ मुझे ! सहसा मुझे श्री कृष्ण की याद आयी ! ऐसी सफलतापूर्वक शरारत उन्हीं की हो सकती है। आखिर अर्जुन भी तो उन्हीं का सखा है ! कहाँ दिव्यास्त्रों की झड़ी लगी थी और कहाँ एक साधारण बाण बीच में आ गया !
मुझे पूर्व काल का एक प्रसंग याद आ रहा है– समुद्र लांघन के समय सुरसा मुख बढ़ाये जा रही थी, हनुमत बड़ा आकार लेते जा रहे थे – अचानक उन्होंने साधारण रुप लिया और सुरसा के मुख में जाकर आ भी गये। माता की बात भी रख ली और आप भी बच निकले। क्या वहीं प्रसंग नये रुप में अभी घटित नहीं हुआ है ? इसे कहते है विनयशील वीरता का कौशल– कौशल नहीं, तो फिर क्या नाम दिया जाना चाहिए– मस्तिष्क कुछ काम नहीं कर रहा, वह तो जैसे किसी लाल–लाल सागर में गोते लगा रहा है। मैं समझता हूँ , चेतना का थोड़े ही पल का साथ है..................अब...............रथ...............युद्ध.............पानी ! .........................
प्रतीत होता है अभी ब्राह्ममुहूर्त्त भी नहीं हुआ, वर्ना मेरा शुक अब तक पूकार लिया होता। निश्चय ही काफी पूर्व आँख खुल पड़ी है। बूढ़ों की नींद का कहना ही क्या ? आती भी है खूब देर से और पहले ही भाग जाती है। सारे ....... अरे ! यह शीतल वायु बार–कानों से क्यों टकरा रही है, जैसे – – जैसे कोई पंखा झल रहा हो । तो क्या मैं रुग्ण हूँ ? कदाचित् – ओह ! ( हिलने से पार्श्व में दर्द हुआ।)
" महाराज ! ........"
अरे, यह तो मेरे सारथी का स्वर है। बड़ी व्यग्रता है उसमें , तो क्या– –
( धीरे–धीरे आकृतियां स्पष्ट होती जा रही हैं। जिन्हें मैं लाल सागर सा समझ रहा था वे लाल व नीले धुँयें थे जो अब छँटने लगे हैं। और , यह तो मैं रथ में हूँ ! )
" दर्पसेन !" मेरे मुख से निकली आवाज मुझे ही अपरिचित लग रही है! मेरी पुकार पर सारथि के होंठ हिले हैं मगर कोई शब्द बना नहीं है। देखता हूँ, वातावरण में तीखी गंध ( बारुद जैसी ) धूम फैली हुई है–।
अचानक मुझे सब कुछ याद आ गया !
मैं और अर्जुन आमने सामने थे ,फिर–
और मैं उठ बैठा !
दर्द और सारथि, दोनों ने ही मुझे ऐसा करने से रोका , पर मैं व्यग्र था, इतनी देर में जाने क्या अनहोनी हो चुकी हो ! मैंने प्रयत्न किया और छत्रस्तंभ पकड़ खड़ा हो गया। मेरी दृष्टि सेना के मध्य गई मगर कुछ स्पष्ट दिख न सका । मेरा मंतव्य समझ सारथि अपनी तैयारी में जुट गया। उसे पता है, ये एकाध बाण पितामह के लिए कुछ नहीं हैं, बस जरा सी मूर्च्छा थी।
रथ सेना के समीप चला— देखता हूँ, कर्ण, द्रोणजी आदि एक अर्जुन के पीछे पड़े पसीना-पसीना हो रहे हैं और वह सबको चुन-चुन कर उत्कृष्ट बाणों से स्वागत कर रहा है।
सहसा मुझसे उसकी दृष्टि मिली है—
और सच, मैंने पुनःश्च वहीं मुस्कान चेहरे पर खिलती देखी !
वहीं, चपल, मधुर मुस्कान! इसबार मैंने श्रीकृष्ण को याद करने की जगह धनुष-बाण उठा लिए—
पर व्यर्थ ! तबतक सबकुछ धुँआँ-धुँआं हो चुका था ।
और मेरे रथ के घोड़े जानें क्यूँ बिदक कर भागे लिए और दूर जाकर खड़े हो गये।
मैं हँसता-हँसता रह गया—
'हो गई संध्या तक की छुट्टी !'
इस मोहास्त्र का प्रभाव शीघ्र नहीं जाता !
और इस गाढ़े धुँए में कैसे लक्ष्यवेध किया जाए ? जाने बाण किसे जाकर लगे—
अर्जुन क्या वहाँ खड़ा प्रतीक्षा कर रहा होगा !
मेरी दीर्घनिःश्वास निकल गई और मैं चुपचाप धुँए के कम होने की प्रतीक्षा करने लगा, इसके अतिरिक्त चारा ही क्या था।
और , जब गंध व धूम कुछ देखने-सहने योग्य हुआ तो रथ दौड़वाकर सेना के मध्य पहुँचा—
अरे ! क्या कहूँ !
हँसी के मारे मेरी शब्द-ध्वनि पानी के बुलबुले की भांति मुँह में, वा कि कंठ में ही विलीन हुई ज