27/03/2023
सन्देश "विश्व रंगमंच दिवस" (भारतीय दृष्टि )
भारतीय और पश्चिमी अभिनय दृष्टि में मूल अंतर यह है कि पश्चिमी पद्द्ति कहती है कि अभिनय जीवन का अनुकरण (नकल ) है l जबकि भारतीय पद्द्ति में अभिनय नकल न होकर अनुकीर्तन है l अनुकरण का मतलब है देखे - भोगे हुए यथार्थ की हूबहू नक़ल करना l जबकि अनुकीर्तन हमें देखे भोगे हुए में स्वयं को जोड़ने का मौका देता है l और स्वयं को जोड़ने का मतलब है हमारी स्वतंत्र चिंतन शक्ति , कल्पना और आश्चर्य करने की क्षमता आदि का समावेश होना l
जहाँ मनुष्य अन्य मनुष्य को देखने सुनने की इच्छा लिए एक साथ, एक जगह बैठते हैं l फिर जहाँ मनुष्य एक ऐसी सृस्टि का निर्माण करते हैं जिसमें सभी (देखने -सुनने वाले भी ) सम्मिलित हो जाते है l फिर मनुष्य एक दूसरे से मिलते हैं......ऐसा भला कहाँ सम्भव है l
तब से लेकर अब तक ऐसी कई सृष्टियाँ बनती बिगड़ती रही हैं और बनती बिगड़ती रहेंगी l इसीलिए तो अंत में मनुष्य (अभिनेता ) अन्य (दर्शक ) के सामने झुकते हैं और अपने अहं को त्यागते हैं l क्योंकि फिर से उन्हें जन्म लेना है और फिर से एक नई सृष्टि का निर्माण करना है l
इसलिए गर्व कीजिये कि आप अभिनेता हैं, वह भी रंगकर्म के l
उपनिषद में एक जगह आया है कि देवताओं को यह अच्छा नहीं लगता कि मनुष्य अपने आप को पहचाने l यहाँ संदर्भ दूसरा है लेकिन इसे रंगकर्म के सन्दर्भ में देखें तो क्योंकि हम जिस समय नयी सृष्टि का निर्माण करते हैं l उस समय हम अपने आप को पहचान रहे होते हैं l लिखा है कि स्वयं को जानने पर "मैं ब्रह्मा हूँ " ऐसा भान होता है l और यही देवताओं को पसंद नहीं l
"जैसे अनेक पशु मनुष्य के उपयोग में आते हैं वैसे ही एक एक मनुष्य देवों के उपयोग में आते हैं l जैसे एक पशु भी यदि कोई चुराकर ले जाये तो मनुष्य को बहुत बुरा लगता है l वैसे ही मनुष्य इस ब्रह्मा (स्वयं को पहचानना ) को जाने तो देवताओं को यह पसंद नहीं आता l" (उपनिषद से )
इसीलिए गर्व कीजिये कि आप अभिनेता हैं वह भी रंगकर्म के l
चित्र महान अभिनेता और गुरु अम्मानूर माधव चक्यार का है l
धन्यवाद l
(आश्रम पैराफ़िन, ग्राम रोटेदा, कोटा, राजस्थान )