02/02/2026
1 फरवरी को प्यारे मोहन सहाय की पुण्यतिथि मनाई जाती है इस अवसर पर वसंत पैलेस में ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया
इस आयोजन में बसंत कुमार बचपन सर ने हमें आमंत्रित किया इसके लिए सर आपका आभार धन्यवादll
" प्यारे मोहन सहाय जी का संक्षिप्त परिचय"
13 मई, 1929 को प्यारे मोहन सहाय का जन्म हुआ प्यारे मोहन सहाय, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित, बिहार के पहले पेशेवर नाट्यकर्मी थे, जिन्होंने सुरुचिपूर्ण, आधुनिक रंगमंच से प्रदेश और पटना को परिचित करवाया। वे न सिर्फ अच्छे अभिनेता थे, बल्कि मौलिक नाट्य-अभिकल्पक और निर्देशक भी थे।
प्यारे मोहन सहाय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ( NSD ) के प्रथम बैच 1961 के ग्रेजुएट थे। उन्हें स्टेज क्राफ़्ट में स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था। इसी दौरान उन्होंने रामकुमार वर्मा की "औरंगज़ेब की आख़री रात" एवं जगदीशचंद्र माथुर की "कोणार्क" नाटक का सफ़ल मंचन किया था। 1968 में उन्होंने बादल सरकार की "एवं इंद्रजीत" का निर्देशन किया जिसने बिहार रंगमंच को एक नये आयाम से जोड़ा। आधुनिक एवं प्रयोगधर्मी हिंदी रंगमंच से लोगों का परिचय करवाया। इस नाटक में सतीश आनन्द मुख्य भूमिका में थे जिन्होंने आगे चलकर बिहार रंगमंच को गति प्रदान की एवं समृद्ध किया। इस नाटक में उन्होंने पहली बार "बॉक्स थिएटर" का प्रयोग किया था, जो उस समय के लिये पटना रंगमंच के लिये नया था। आगे चलकर उन्होंने रामेश्वर सिंह कश्यप का "निलकंठ निराला" नाटक किया जिसमें उन्होंने स्वयं निराला की भूमिका की थी। यह नाटक काव्यमय एवं एकल था। अभिनय को लेकर यह एक मील का पत्थर था। इसके अलावे उन्होंने नष्टनीड़ पर आधारित नाटक ‘षोडषी’, ‘ऐन इंस्पेक्टर काल्स’, ‘शुतुरमुर्ग’ आदि अनेक नाटकों का मंचन किया।
उनके फ़िल्मों का सफ़र 1972 में मृणाल सेन की फिल्म ‘पदातिक’ से हुई। इस फिल्म की शुटिंग पटना के निकट बिहटा के चीनी मिल में हुई थी। बाद में उन्होंने ‘कल हमारा है’, ‘दामुल’, ‘मृत्युदंड’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘तहलका’, ‘पुलिस वाला गुण्डा’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। "मुंगेरीलाल के हसीन सपने" धारावाहिक में उनकी भूमिका काफी यादगार रही।
2008 में उनका अंतिम नाटक 'समाधान' था और दो साल बाद 01 फरवरी, 2010 को उनका देहांत हो गया।
सभारllll
राष्ट्रीय रंग लोक उनकी स्मृतियों को प्रणाम करता है और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
आपका सुमन वृक्ष